रिपोर्टर/अमित कुमार
चन्दौली गोंड वीरांगना महारानी दुर्गावती का 459वां बलिदान दिवस का आयोजन शनिवार को दिव्य वाटिका चंदौली में आयोजित किया गया। जिसमें कार्यक्रम के अध्यक्ष मुन्नी गोंड ने दीप प्रज्ज्वलित व माल्यार्पण कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। तत् पश्चात गोंडी संस्कृति, गोंड़उ गीत व नृत्य प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ कुंदन गोंड ने कहा कि गोंड विरांगना महारानी दुर्गावती के गौरवशाली इतिहास के बारे में विस्तृत जानकारी देते हुए कहा कि जिस प्रकार से रानी दुर्गावती ने अपने प्राणों की बलि देकर अपने स्वाभिमान की रक्षा करते हुए अपने प्राण त्याग दी। उन्होंने कहा कि महारानी दुर्गावती चंदेल वंश के राजा कीर्ति सिंह चंदेल की पुत्री थी।
इनका जन्म दुर्गा सप्तमी के दिन होने के कारण इनके चेहरे तेज को देखते हुए राजा कृति सिंह ने उनका नाम दुर्गावती रख दिया दुर्गावती बचपन से ही तलवार चलाने और घुड़सवारी करने की शौक होने के कारण तलवार चलाने की कला एवं घुड़सवारी करने में निपूर्ण थी। दुर्गावती का विवाह गढ़ मंडला के राजा संग्राम शाह के बेटे दलपत शाह हुआ था। दलपत शाह एक प्रतापी राजा रहे थे अगर उनकी मृत्यु असामयिक होने के कारण पूरा जिम्मेदारी महारानी दुर्गावती के ऊपर आ गई दलपत शाह की मृत्यु उस समय हुई जब उनका बेटा वीर नारायण 4 साल का था महारानी ने 4 साल के बेटे वीर नारायण का राज्याभिषेक कर राज्य की कमान अपने हाथों में लेकर राज्य चलाने लगी। महारानी दुर्गावती की वीरगाथा की चर्चा अन्य देशों के राजाओं के बीच होती थी ।
इस बात की जब खबर मुगल राजा अकबर को पता चला तो उसने अपने सेनापति आसफ खान को मंडला गढ़ पर आक्रमण करने का आदेश दे दिए ।अकबर की सेना को महारानी दुर्गावती द्वारा तीन - तीन बार पछाड़ दिया गया था। महारानी को जीत मिली मगर उनकी सेना की बहुत क्षति हुई थी। जिसके कारण रानी बहुत दुखी थी। मगर उनकी सेना जीत हासिल करने की खुशी में खुशियां मना रहे थी। उसी समय आसफ खान ने गढ़ मंडला पर चढ़ाई कर दिया। जिसमें घमासान युद्ध हुआ जिसमें महारानी का 14 वर्षीय पुत्र वीर नारायण वीरगति को प्राप्त हो गया। जिसकी खबर रानी को उनके सेनापति द्वारा मिली तो रानी जरा भी विचलित ना हुई। बल्कि उन्होंने अपने सेनापति से कहा कि मेरे लिए मेरी प्रजा ही पुत्र है आप युद्ध करिए रानी की इस साहस को देखते हुए। सेनापति ने युद्ध करने लगे ।
दुर्भाग्यवश रानी अचानक घायल हो गए जिससे सेनापति में हमको स्वच्छता स्थान पर पहुंचाने की बात रखी मगर महारानी में युद्ध छोड़कर जाने के लिए तैयार नहीं हुई उन्होंने सेनापति से कहा कि अपनी तलवार से मेरे सर को कम कर दो मगर सेनापति ने अपने रानी का आज्ञा का पालन न कर ने की असमर्थता जताई। रानी ने दुश्मन की सेना की गिरफ्त में आने से अच्छा है कि अपने प्राणों की बलि चढ़ा देना ही सबसे बड़ी समझदारी है । और उन्होंने अपने ही कटार से अपने प्राणों की बलि दे दी। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विशिष्ट अतिथि चकिया विधायक कैलाश आचार्य ने कहा कि गोंड आदिवासी समाज का इतिहास स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है। अगर देश के आदिवासी समाज के लोग जिस दिन संगठित हो जायेगा।उसी दिन दुबारा गोंडवाना राज्य पुनः स्थापित किया जा सकता है। केवल हमें बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर के बताए हुए मार्ग पर चलने की जरूरत है। कार्यक्रम में आए विशिष्ट अतिथियों को अंगवस्त्र व स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम में उपस्थित चकिया के वरिष्ठ पत्रकार शीतला प्रसाद को अंग वस्त्र व स्मृति चिन्ह देकर पत्रकार रघुनाथ प्रसाद गोंड ने सम्मानित किया। आदिवासियों के इस कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि राज्यसभा सांसद दर्शना सिंह के ना आने के कारण आदिवासी समाज के लोगों में तरह-तरह की बातें करते चुना गया। कुछ लोगों ने यहां तक कह दिया कि मंत्री विधायक केवल हम लोगों का वोट लेने के लिए हम लोगों के आते हैं मगर इस प्रकार के कार्यक्रम में वह नहीं आते हैं जिसका उदाहरण इस महारानी दुर्गावती की बलिदान दिवस कार्यक्रम में नहीं आना प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। कुछ लोग तो लोकप्रिय विधायक व विशिष्ठ अतिथि सुशील सिंह को सुनने और देखने के लिए कार्यक्रम में भाग लिए थे ।मगर उनके भी ना आने के कारण उनके समर्थक मायूस होकर वापस चले गये। कार्यक्रम में गौरव श्रीवास्तव, गोंड, रामकेश गोंड, कमलेश गोंड, कल्लू गोंड, महेंद्र प्रताप गोंडसे, विनायक गोंड, गुड्डू गोंड, प्यारे लाल गोंड, रामअवध गोंड,पिंटू गोंड, रामजी गोंड, संतोष गोंड, शशांक कुमार गोंड,संजय गोंड सहित अन्य लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता मुन्नी गोंड व संचालन रामदुलार गोंड ने किया।


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